Saturday, April 28, 2018

श्री ओम सनातन धर्म अंतरराष्ट्रीय महासभा



श्री ओम सनातन धर्म अंतरराष्ट्रीय महासभा का गठन वर्ष 2017 में किया गया था और यह संस्था सनातन धर्म के प्रचार एवं धर्म की रक्षा के लिए कृत संकल्प है। संस्थापक अध्यक्ष सतीश बेरी स्वयं ईश्वर प्राप्ति के लिए समाधि लगाते हैं और प्राप्त हुए अनुभवों का प्रचार-प्रसार विभिन्न माध्यम से करते हैं।

श्री सनातन धर्म की उत्पत्ति का काल समय कोई भी नहीं बताया है। सनातन धर्म के धर्मग्रंथों का अध्ययन किया जाये तो ज्ञात होता है कि जो वेद हैं वो अरबों साल पहले लिखे गये हैं और वेदों में जो भी लिखा गया है वह भी आज अक्षरश: वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरा उतरा है।
वेदों ने तो अपनी प्रमाणिकता सिद्ध कर दी थी किंतु जो उसकी प्रमाणिकता पर पूर्व में जो वैज्ञानिक सवाल उठाते रहे हैं वो ही यह मानने लगे हैं कि दिमाग-हृदय के साथ एक आत्मा भी ईश्वर में वास करती है जिसे परमात्मा का अंश माना गया है। अगर हम सनातन धर्म के ग्रंथों को देखें तो पता लगता है कि आज से सौ साल बाद जिस दिवाली होगी, उस दिन अमावस्या होगी और उस दिन चंद्रमा कभी भी दर्शन नहीं देंगे। वो अपने चक्र की गति को एक दिन पूर्व ही पूरा कर लेंगे। जबकि कुछ अन्य धर्मावलंबी यही मानते हैं कि अगर कल चांद दिखा तो परसों हमारा पर्व है लेकिन सनातन धर्म में भी सभी त्योहार पूर्णमासी या चंद्रमा के दिन ही होते हैं और कभी भी चंद्रमा ने वेदों की बताये गये आदेशों का उल्लंघन नहीं किया है।

सनातन धर्म में सबसे ज्यादा देवता होते हैं। इसका कारण यह होता है कि हमारे स्वास्थ्य, धर्म, शिक्षा, भोजन की जो व्यवस्था करता है, वही देवता होता है। यही सनातन धर्म का मूल है। नर सेवा को ही नारायण सेवा माना गया है। पशु हो या पक्षी सनातन धर्म में उनको भी पूजा करने योग्य माना गया है। यही कारण है कि कभी भी सनातन धर्म का अनुयायी किसी का बुरा करने का नहीं सोचता।
समय काल के साथ जो परिवर्तन आये हैं, वह दूसरे अन्य धर्म के अनुयायियों को देखकर ही आया है। मांस-मदिरा को सनातन धर्म में वर्जित माना गया है क्योंकि इसमें एक प्राणी की मौत के बाद मांस पकाया जाता है और सनातन धर्म में यही कहा गया है जिस तरह से परमात्मा का अंश पुरुष में विद्यमान है, उसी तरह का परमात्मा का अंश याने आत्माराम उस जीव रूपी पशु-पक्षी में भी विद्यमान है। दूसरे की सहायता, सेवा करना ही परमोधर्म भारतीय ग्रंथों का मूल रूप है।
सनातन धर्म में ही यह गणना की गयी है कि मनुष्य का जीवन सांसों पर निर्भर है। यह अरबों साल पहले लिखा गया और आज चिकित्सक भी यही मानते हैं कि आक्सीजन की कमी से मनुष्य की मौत हो जाती है। लम्बा, निरोगी जीवन जीने के लिए हमारे महान संतों महार्षि वाल्मीकि, महार्षि मार्कण्डेय, महार्षि मुग्धा, महार्षि वेद व्यास, महार्षि पतंजली ने हमें ईश्वर की साधना अधिकाधिक करने के लिए कहा था और इसे ध्यान कहा गया है। ध्यान में मनुष्य बिना सांस लिये भी कई दिन तक जीवित रहता है और वही सांस उसको लम्बी आयु प्रदान करते हैं। अगर महाभारत के काल को देखा जाये तो उस समय महार्षि वेद व्यास के तपबल से ही पांडवों और कौरवों के पिता का जन्म हुआ था। महाभारत काल बीत गया और उसके सैकड़ों साल बाद महार्षि वेद व्यास ने महाभारत ग्रंथ की रचना की थी। इसी तरह से भगवान वाल्मीकि ने भगवान श्रीराम के जीवन से पूर्व ही रामायण की रचना कर दी थी और उस रचना के सैकड़ों साल बाद भगवान श्री विष्णु ने जब श्रीरामचंद्र जी के रूप में अवतार लिया। उसके बाद उनके संतान लवकुश हुईं तो उनका अध्ययन भी भगवान वाल्मीकि ने ही करवाया था।
सनातन धर्म का अर्थ यही है यह अनंत है। इसके आदिकाल या अंतकाल का कोई वर्णन किसी भी ग्रंथ में नहीं है। सनातन धर्म हमें सदैव सहिष्णुता का ही उपदेश देता है। आज पश्चिमी देश अपनी संस्कृति को भूलकर भारतीय संस्कृति मेडिटेशन याने ध्यान-साधना को अपना रहे हैं और वहीं भारतीय पश्चिमी संस्कृति के भंवर में फंसकर स्वयं को अंधेरे कुएं में धकेल रहे हैं। कर्मकांड का उल्लेख वेद में नहीं है और यही स्वामी विवेकानंद, भगवान श्री गुरु नानक देव जी और भगवान महावीर ने भी यही कहा है कि मनुष्य तो मनुष्य है। न तो इसकी कोई जाति है और न ही मृत्यु के पश्चात कर्मकांड के माध्यम से उसका कोई भला हो सकता है। जीवित रहते हुए ही जब वह स्वयं अपने दिल में वास करने वाले भगवान को प्राप्त कर लेता है तो निश्चित रूप से ही उसका जीवन सफल हो जाता है। 

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