झुके हुए कंधे, गिरा हुआ धनुष बताता है- कृष्ण के रूप में सारथी और न ही भीम-युद्धिष्ठर जैसे साथी मिले
श्रीगंगानगर। सनातन धर्म का इतिहास देखा जाये तो देखा जाता है कि भारत देश में धर्म के लिए अनेक युद्ध हुए हैं। त्रेता युग में भगवान श्री विष्णु ने श्रीराम का अवतार धारण कर रावण के साथ युद्ध लड़ा। वह युद्ध भी धर्म की जीत के रूप में ही हम जानते हैं। क्योंकि रावण के पास अहंकार था। उसके पुत्र मेघनाथ के पास छलकपट था और उसके भाई कुंभकरण के पास आलस्य (वह छ: माह के बाद एक दिन के लिए ही नींद से उठता था और फिर सो जाता) था। तीनों को ही भगवान श्रीराम ने युद्ध में हराकर बता दिया कि यह अहंकार, छलकपट और आलस्य ही मनुष्य के दुश्मन है और इसी बात को याद करने के लिए ही महार्षि वेद व्यास जी के बताये गये मार्ग के अनुसार ही हम हर साल दशहरा बनाते हैं ताकि अहंकार, छलकपट और आलस्य को सदा के लिए समाप्त कर दें।
दूसरा युद्ध द्वापर युग में हुआ। भगवान श्री विष्णु ने इस बार भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। इस बार उनके सामने एक बार फिर से अहंकार ही प्रमुख रूप से दुश्मन था। पहले उन्होंने अहंकार से मंद अपने मामा कंस को काल के मुंह में पहुंचाया। दूसरा युद्ध उन्होंने महाभारत के मैदान में लड़ा और वो भी बिना शस्त्र के। पांडवों की सेना दर्योधन की सेना के मुकाबले कमजोर थी। उनके पास भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण सहित अनेक महान योद्धा था। जबकि पांडवों के पास पांचों भाई के साथ भगवान श्रीकृष्ण थे जो अर्जुन का सारथी बनकर मैदान में थे। उन्होंने इस युद्ध में कोई शस्त्र नहीं उठाने की प्रतिज्ञा की थी किंतु उनके पास शास्त्रों का का ज्ञान था। वे उन शास्त्रों के स्वयं रचियता थे। उससे ही महाग्रंथ गीता व महाभारत लिखे गये। इस युद्ध में ही भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के वो उपदेश दिये जो आज करोड़ों साल बाद भी प्रासंगिक हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने सिर्फ अपने उपदेश से ही अर्जुन को आत्मज्ञानी और बलशाली बना दिया जो कौरवों की भारी सेना को पराजित करने में कामयाब रहे।
अगर तीसरा धर्म युद्ध देखा जाये तो यूनान के अतिक्रमणकारी सिंकदर ने भारत पर आक्रमण का दुस्साहस किया था। उस समय पौरस देश के राजा पौरस ने सिकंदर को कई बार पराजित किया किंतु वह धर्म भूल गये थे। धर्म के अनुसार देश का दुश्मन मानवता का दुश्मन होता है और पोरस ने सिंकदर को पकड़ में आने के बावजूद जीवित छोड़ दिया किंतु कपटी सिंकदर ने जब अपने कपट से पौरस को हराया तो उसने पौरस को जीवित नहीं छोड़ा। मंदिरों आदि से लूटपाट कर वह सोना ले गया किंतु वह सोना उसके किसी काम नहीं आया। वह जीवित अपने देश यूनान नहीं पहुंच पाया। भारतीय जल सीमा को भी नहीं लांघ पाया।
सिंकदर के बाद भारत पर बार-बार आक्रमण होते रहे। मोहम्मद गजनवी, बाबर आदि अतिक्रमणकारियों ने भारत के धार्मिक स्थलों को भारी नुकसान पहुंचाया और इन अतिक्रमणकारियों ने भारत के धार्मिक शास्त्रों को खंडित किया। इसके बाद करीब आठ सौ सालों तक मुगलों का राज चला। कलयुग में एक बार फिर से भगवान विष्णु जिनको अकाल पुरुख या आदि शक्ति हिन्दू ग्रंथों में बताया गया है। उन्होंने ही गुरु गोविंदसिंह के रूप में अवतार लिया और उन्होंने एक बार फिर से धर्म की पताका को लहरा दिया। हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए ही गुरु गोविंदसिंह से पहले उनके पिता गुरु तेगबहादुर जी ने अपनी शहादत दी और फिर गुरु गोविंदसिंह जी ने अपने चार साहिबजादों को धर्म की रक्षा के लिए कुर्बान कर दिया और अपनी आंखों से एक आंसू भी नहीं आने दिया। माता गुजरी जी ने भी इस धर्मयुद्ध की लड़ाई में अपने परिवार को कभी पीठ नहीं दिखाने की शिक्षा नहीं दी। धर्म की रक्षा को ही उन्होंने सर्वोपरि माना।
2014 में एक नये युग का आगमन हुआ। भारत देश में हिन्दुत्व का बोलबाला हो गया। यह पहला मौका था जब चुनाव में हिन्दुत्व ही मुद्दा बन गया था और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसी कारण बने। वे प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने देश के विकास का नया सपना दिखाया था। लगा था भारत के युवाओं के ख्वाब हकीकत बन जायेंगे। कालाधन जो बेनामी सम्पत्ति के कारण लोगों के लिए विष बन गया है, उसको समाप्त कर दिया जायेगा। आर्थिक जानकार तो यही मान रहे थे कि अगर आयकर को समाप्त कर दिया जाये तो भारत एक विकसित देश कुछ ही सालों में बन सकता है क्योंकि अनेक बड़े व्यापारी आयकर चोरी करते हैं और इस कारण पैसा तिजोरियों में ही रह जाता है और वह आर्थिक विकास में बाधक बन जाता है। वह पैसा मार्केट में आता ही नहीं और उससे बेनामी सम्पत्ति में खर्च किया जाता है जिससे प्रोपर्टी के दामों में भारी बढ़ोतरी होती है। भारत के कुल बजट में आयकर का योगदान सिर्फ 4 लाख करोड़ के आसपास ही रह जाता है जबकि इतना ही धन हर साल कालाधन के रूप में लोगों की तिजोरियों में पहुंच जाता है।
नरेन्द्र मोदी ने जो सपने 2014 में दिखाये थे वह 2018 आते-आते समाप्त हो गये हैं और बचे हुए अन्तिम 7-8 माह में बड़ा कमाल होने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि नोटबंदी, जीएसटी और जेटली की नीतियों के कारण आर्थिक विकास को भारी नुकसान हुआ है। विदेशी निजी एजेंसियां भारत को भले ही कोई भी रेटिंग दे रही हों जबकि हकीकत यही है कि भ्रष्टाचार, बेरोजगारी आज भी 2014 से पहले की तरह बड़ा मुद्दा ही है।
नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों लंदन में एक कार्यक्रम में भाग लिया। इस कार्यक्रम का भारत सहित कुछ अन्य देशों में सीधा प्रसारण किया गया। इसमें प्रधानमंत्री ने अपने नजदीकी सेवक सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी को इंटरव्यू दिया था। इस इंटरव्यू में मोदी ने एक बात को स्वीकार किया कि उनसे गलतियां हुई हैं। वह भी आम इंसान हीं हैं। कोई महान पुरुष नहीं है। उन्होंने कुछ इस तरह के बयान भी दिये जिससे लगा कि वह अपनी हिटलरशाही छोडऩा चाहते हैं। सभी लोगों की बात को सुनना चाहते हैं लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उनको इस सोच तक आते-आते बहुत देर हो गयी।
लंदन में आयोजित कार्यक्रम में विदेशी भारतवंशी थे। इनसे मोदी ने मुलाकात भी की। उनके साथ हाथ भी मिलाये। इस दौरान टीवी पर सीधा प्रसारण हो रहा था और उनकी जीवनी पर नजर रखने वालों ने साफ देखा कि मोदी के कंधे महाभारत युद्ध के अर्जुन की तरह झुके हुए थे। अर्जुन ने तो अपने सामने अपने रिश्तेदारों, भाई-भतीजों को देखकर करूणा से अपना तीरकमान गिरा दिया था और जमीन पर गिर गये थे। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उपदेश दिये जो हम गीता के माध्यम से अध्ययन करते हैं। आत्मसात करते हैं।
दूसरी ओर मोदी के झुके हुए कंधे और चेहरे पर भारी परेशानी यही बता रही है कि वह महाभारत (चुनाव) जीतकर भी स्वयं को हारे हुए महसूस कर रहे हैं। लगता तो यही है कि उनके तीरकमान गिर गये हैं। उनके सबसे नजदीकी लोगों पर नजर डाली जाये तो अमित शाह उनके सारथी बने हुए थे। अरुण जेटली उनके लिए युद्धिष्ठर थे। नीतिन गडकरी और राम माधवन भी नुकुल और सहदेव की भूमिका में थे लेकिन चार साल गुजरने के बाद पता लगा कि यह तो वो चेहरे ही नहीं थे जो दिखाये गये थे। ऐसा लग रहा था कि मोदी रूपी अर्जुन को हराने के लिए कौरवों ने ही युद्धिष्ठर, भीम, नुकुल, सहदेव आदि का रूप धारण कर लिया था और उनके विश्वास से ऐसा धोखा दिया कि अब भाजपा और जनता के बीच की दूरिया बहुत दूर हो गयी लगती हैं। बेरोजगार आज चार सालों बाद भी बेरोजगार है। जेटली की नीतियों के कारण करोड़ों लोगों की नौकरी छूट गयी या कम वेतन पर काम करना पड़ रहा है। नीतिन गडकरी परिवहन मंत्री हैं और उन्होंने रोड पर चलने पर ही टैक्स लगा दिया है। एक किमी का टोल टैक्स एक रुपये से भी ज्यादा का है। नैशनल हाइवे पर सफर करना ऐसा लगने लगा कि कोई बड़ी गलती कर दी है। ऐसा लगने लगा कि सरकार के पास जनता की सड़क सुरक्षा के प्रति कोई जिम्मेदारी ही नहीं है। इतना बड़ा टोल टैक्स लगने के कारण आम व्यक्ति को आर्थिक नुकसान होता ही है। वहीं खाद्यान्न लेकर आने वाले ट्रकों को कार के मुकाबले कई गुणा अधिक टोल टैक्स देना पड़ता है और इस कारण खाद्य पदार्थों के भाव आसमान तक पहुंच गये हैं। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।
सरकार की नीति किसानों को स्वावलंबी बनाने से ज्यादा उनको कर्जदार बनाने की रही और यही कारण है कि आज पंजाब जैसे विकसित सूबे में भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं। सरकार की नीतियों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। सरकारी आकड़े चाहे कुछ भी बोल रहे हों पिछले चार सालों में आम आदमी को दो वक्त की रोटी के लिए दिन के साथ-साथ रात को भी काम करना पड़ रहा है।

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